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मेरा बचपन

घरवाले नाराज़ क्यों हुए

जानो कि गुल्ली-डंडे पर घरवाले नाराज़ क्यों हुए।

पाठ 'मेरा बचपन' के आखिरी हिस्से में प्रेमचंद बताते हैं कि गुल्ली-डंडे के पीछे वे कितने दीवाने थे। वे कहते हैं: हर किसी की अपनी-अपनी रुचि होती है, पर मुझे तो गुल्ली ही सब खेलों से अच्छी लगती है।

सुबह होते ही वे घर से निकल जाते, पेड़ पर चढ़कर टहनियाँ काटते और गुल्ली-डंडा बनाते। उन्हें वह उत्साह याद है, वह लगन, खिलाड़ियों का जमघट (भीड़), खेल के लड़ाई-झगड़े और सबका सरल स्वभाव।

सबसे अच्छी बात यह थी कि इस खेल में अमीर और गरीब का कोई भेद नहीं था। कोई किसी से बड़ा या छोटा नहीं था, इसलिए घमंड (अभिमान) की कोई जगह ही नहीं थी। सब मिलकर खेलते थे।

पर इस धुन का एक नतीजा भी था। खेल में डूबे लेखक को न नहाने की सुध रहती थी, न खाने की। इसलिए घरवाले उनसे नाराज़ होकर बिगड़ते थे, और पिताजी चौके (रसोई) में बैठे-बैठे अपना सारा गुस्सा रोटियों पर उतारते थे!

फिर भी लेखक कहते हैं: गुल्ली है तो ज़रा-सी, पर उसमें दुनिया भर की मिठाइयों की मिठास और सारे तमाशों का आनंद भरा है।

गुल्ली-डंडे की धुन में लेखक को न नहाने की सुध रहती थी न खाने की, इसलिए घरवाले और पिताजी नाराज़ रहते थे; लेखक को गुल्ली सबसे अच्छी लगती थी क्योंकि उसमें अमीर-गरीब का भेद और अभिमान नहीं था।

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