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खानाबदोश

ओमप्रकाश वाल्मीकि और दलित साहित्य

लेखक और कहानी की पृष्ठभूमि समझाना।

लेखक. ओमप्रकाश वाल्मीकि (सन् 1950-2013) का जन्म उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले के बरला गाँव में हुआ। उनका बचपन और पढ़ाई सामाजिक और आर्थिक कठिनाइयों में बीते।

  • महाराष्ट्र में वे दलित लेखकों के संपर्क में आए और डॉ. अंबेडकर की रचनाएँ पढ़ीं; इससे उनकी रचना-दृष्टि बदल गई। बाद में वे देहरादून में एक सरकारी कारखाने में अधिकारी रहे।
  • हिंदी दलित साहित्य के विकास में उनकी बड़ी भूमिका है: जाति के कारण होने वाले अपमान और उत्पीड़न का सीधा, सच्चा चित्रण। वे मानते थे कि इस पीड़ा का प्रामाणिक अनुभव वही लिख सकता है जिसने उसे झेला हो।
  • आत्मकथा 'जूठन' से उन्हें पहचान मिली; अन्य रचनाएँ: 'सदियों का संताप', 'बस! बहुत हो चुका', 'सलाम', 'घुसपैठिये', 'दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र'।

कहानी. 'खानाबदोश' ईंट-भट्ठे के मज़दूरों के शोषण की कहानी है। यह दिखाती है कि जो लोग ईमानदारी और इज़्ज़त से जीना चाहते हैं, उन्हें ताकतवर लोग जीने नहीं देते; और यह भी कि शोषित मज़दूर भी जातिवादी सोच से पूरी तरह मुक्त नहीं हैं।

  • स्थानीय बोली के संवाद ('म्हारा', 'बणाना', 'रोट्टी') पात्रों को जीवंत और कहानी को वास्तविक बनाते हैं।

नया उदाहरण. किसी निर्माण-स्थल पर रोज़ दिहाड़ी पर काम करने वाले मज़दूर, जिन्हें न पक्का घर है न पक्की मज़दूरी, हर कुछ महीनों में अगली साइट पर चल देते हैं: आज के शहरों में भी अनेक 'खानाबदोश' हैं।

पीड़ा की प्रामाणिक आवाज़।

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