अनुवाद की प्रक्रिया / The Process of Translation
अनुवाद का विश्लेषण: दृष्टियाँ और सोपान
अनुवाद की प्रक्रिया का ढाँचा समझाना।
अनुवाद यानी किसी मसौदे को एक भाषा से दूसरी में इस तरह बदलना कि मूल का आशय आ जाए। पहली शर्त — दोनों भाषाओं (स्रोत और लक्ष्य) में महारत।
कहानी-नाटक में केवल भाषा-ज्ञान काफ़ी नहीं: संवादों का लहजा, मुहावरे, व्यंग्य और भाव हर भाषा में अलग होते हैं; शब्दकोश से किया अनुवाद सपाट रह जाता है। कहानी का अनुवादक दोहरी भूमिका निभाता है — मूल की आत्मा में पैठना और फिर उसे लक्ष्य भाषा का मौलिक चोला पहनाना।
दो दृष्टियाँ: पाठपरक (अनूदित रचना मूल के कितनी पास है, बदलाव ठीक नहीं) और प्रक्रियापरक (सर्जनात्मकता केंद्र में; पूछती है कि अनुवाद मूल से अलग है तो क्यों)।
भाषावैज्ञानिकों के अनुसार तीन सोपान — विश्लेषण, अंतरण और पुनर्गठन (नाइडा का आरेख); अनुभवी अनुवादक इन्हें एक छलाँग में पार करता है। अनुवादक की तीन भूमिकाएँ: मूल का पाठक, द्विभाषिक, और अनूदित पाठ का रचयिता।
एक स्कूल मानता है कि रचना को माली की तरह नई भाषा-संस्कृति में प्रत्यारोपित करें — गैर-ज़रूरी पत्तियाँ छाँटते हुए, पर आत्मा बचाते हुए; टैगोर ने 'गीतांजलि' का अंग्रेज़ी अनुवाद खुद करते हुए यही किया।
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