अनुवाद की प्रक्रिया / The Process of Translation
पुनर्रचना: जोड़-घटाव और बार-बार पढ़ना
पुनर्रचना की चुनौतियाँ दिखाना।
छंदबद्ध कविता का छंदबद्ध अनुवाद बिना कुछ जोड़े-घटाए बहुत कठिन है।
जीवनानंद दास की 'बनलता सेन' ऊपर से प्रेम कविता है, भीतर परंपरा, इतिहास और आधुनिकता से टकराती है; भारतभूषण अग्रवाल ने छंद बचाते हुए अनुवाद किया, पर कुछ छूट लीं और पूरी संवेदना नहीं समा पाई — यही अनुवाद की सीमा है, जैसे चित्र की प्रतिकृति में भी अंतर रहता है।
मूल कविता को कई-कई बार पढ़ना बुनियादी शर्त है; एक-दो बार पढ़कर समझ लेने का भ्रम बड़ी चूक करा सकता है।
मूल उपागम समझने के बाद ही तय होता है कि लक्ष्य भाषा के अनुसार कितना फेरबदल चाहिए।
एक कवि-अनुवादक को सेसर वाय्येखो की कविता के 'थॉट एट्स' पर वर्षों अटकना पड़ा — न शब्दकोश काम आए, न विशेषज्ञ; अचानक सूरदास की 'आठ पहर' वाली पंक्ति गुनगुनाते हुए हल मिला: 'आठों पहर की चिंताएँ'। अपनी भाषा की परंपरा भी अनुवाद में मदद करती है।
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